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Hunger and society.

Hunger and society. ———-दुनिया बदली, लोग बदले, समाज की जरूरत बदली. नहीं बदली तो मानव की अतीत से आज तक भूख की अनुभूति. यह पूरी दुनिया की सच्चाई है भूख से दुनिया का हर समाज लड़ता है. आज दुनिया के हर अर्थव्यवस्था में भूख से जंग जारी है. तकनीकी विकास ने भी भूख को बहुत सहज रूप में स्वीकार किया है. संसार के सबसे पिछली कतार में खड़े लोगों के जीवन में बिना बदलाव लाये किसी भी समाज का भला नहीं होगा. भारत और चीन में भूख मरी की पीड़ा काफी भयानक है. एक इंसान सब कुछ सहन कर जाता है पर उसके अपने जब भूख से तड़फ रहे हो तो सारे नैतिक विचार पल भर में बिखर जाते है.

ऐसा भी नहीं है कि भूख मानव को हरा देती है. कभी जापान भी भूख से तड़फ रहा था. 1830ई के बाद जापान ने अपने विकास की रूप रेखा बनायीं, आज हम कहते है कि जापान तकनीक में बहुत आगे है. यह जापानियों की कड़ी मेहनत का नतीजा है आज जापानी तकनीक पूरे संसार में नंबर one है. जिसे पूरी दुनिया स्वीकार कर चुकी है.

भूख से लड़ना देश सेवा है. भूख से लड़ना मानवता की सेवा है. भूख से जो भी इंसान जीतता है उसको दुनिया के किसी भी समाज में सम्मान की नजर से देखा जाता है. भूख नैतिकता को पराजित करने का प्रयास करता है. हम नैतिकता बिहीन समाज की परिकल्पना नहीं कर सकते है. भूख और सम्मान में अंतर होता है. भूख इंसान कहीं भी मिटा सकता है पर सम्मान आपको प्रक्रिया से प्राप्त होता है.

भूख से लड़ना हर मानव का कर्तब्य है. ऐसा नहीं है की धरती पर अनाज का उत्पादन नहीं होता है. होता है पर उसका वितरण बहुत असमान है. दुनिया के बहुत देश गेहूँ, चावल, मक्का को बीच समुद्र में ले जाकर डूबो देते है क्योंकि उनके पास नया स्टॉक रखने के लिये जगह नहीं होती है. हर साल कई लाख करोड़ टन अनाज पूरे धरती पर बेकार हो जाता है.

भारत जैसे देश में प्रतिवर्ष इतना मोटे अनाज का नुकसान होता है . जिससे कई देशों का एक साल का अनाज की जरूरत को पूरा किया जा सकता है.

भूख से हम सब सावधान रहे. हम अपने परिवार को गरीबी से निकाले. अपने देश को भूख से निजात दिलाये. यह कार्य बिना जन भागीदारी के नहीं हो सकता है. हम सब भूख को एक मिशन के रूप में स्वीकार करें. जीवन से भागे नहीं उसका डटकर मुकाबला करें. हमारे बहुत भाई कहते है कि जीने की इच्छा नहीं है. मै उनसे कहना चाहता हूँ हम सब इस धरती माता के संतान है. धरती पर पापी भी विचरण करते है और योगी भी विचरण करते है यह धरती माँ सब का भार बहन करती है. धरती सब का भरण पोषण करती है बिना या सोचें की कौन राक्षस है और कौन संत. जीवन भी भगवान के बनाये नियमों के अनुसार चलता है.

रूस में एक कहावत है कि जो बिना योजना के इस धरती पर आता है उसको झेलना पड़ता है. आधुनिक सामाजिक संरचना में यह सही भी है. हम कम बच्चा पैदा करें, यह भी भूख को कम करने में मद्त करेगा. हमारे कई प्रियजन इस बात से खुश नहीं है कि मै ब्लॉग्स से ज्ञान बाँट रहा हूँ. दोस्तों मैंने जीवन में कुछ प्राप्त किया है बहुत कुछ खोया है. दोस्तों मै यह कहना चाहता हूँ यह केवल मेरा अनुभव है. जो मै शेयर करता हूँ. यदि मेरे विचारों से लोगों के जीवन में बदलाव हो रहा है. यही मेरी कामयाबी है.

भूख को जीवन में स्वीकार करें. 1943ई में जब भारत में अकाल पड़ा था. लाखों लोग मारे गये थे. जिसका मुख्य कारण भूखमरी ही थी. संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने विशाल कार्यक्रम में भूखमरी को शामिल किया है. कई देशों में यह कार्यक्रम नागरिकों को गरीबी से निकलने में सहायता किया है. दुनिया में भूख कहीं भी हो इसको नष्ट करने की साझी जिम्मेदारी दुनिया के हर देश की है. कोई भी देश भूखमरी की अनदेखी नहीं कर सकता है.

मानव के संकल्प में भय, भूख, गरीबी को दूर करने का पूरी दुनिया में साझा सोच विकसित हो रही है.

धन्यवाद.

Adesh Kumar Singh
Adesh Kumar Singh
I am adesh kumar singh, my education post graduate in sociology. My life target? What is the gole of life. My blogs www. thesocialduty.Com, my research only social issu, My phone nu mber-9795205824,my email-adeshkumarsingh93@gmail. com
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